मार्गशीर्ष मास (कृष्ण पक्ष)भगवान
उत्पन्ना एकादशी
इसी दिन भगवान श्रीहरि के शरीर से एकादशी देवी का प्राकट्य हुआ था जिन्होंने मुर दैत्य का वध किया था। जो भक्त पहली बार एकादशी व्रत आरम्भ करना चाहते हैं, उन्हें उत्पन्ना एकादशी से ही आरम्भ करना चाहिए।
पारण नियम: द्वादशी के सूर्योदय के पश्चात ब्राह्मण को अन्न-दान कर फलाहार या सात्विक भोजन से पारण करें।
मार्गशीर्ष मास (शुक्ल पक्ष)भगवान
मोक्षदा एकादशी (गीता जयन्ती)
कुरुक्षेत्र में भगवान श्री कृष्ण ने इसी पावन तिथि पर अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का अमर उपदेश दिया था। यह व्रत पूर्वजों को मोक्ष और साधक को परम पद प्रदान करता है।
पारण नियम: द्वादशी के दिन गीता के 11वें अध्याय का पाठ कर पंचामृत व तुलसी दल से पारण करें।
पौष मास (कृष्ण पक्ष)भगवान
सफला एकादशी
समस्त कार्यों में सफलता और मनोरथों को सिद्ध करने वाली एकादशी। इस दिन दीपदान और रात्रि जागरण का विशेष महात्म्य है।
पारण नियम: द्वादशी तिथि के प्रथम प्रहर में तिल और गुड़ का दान देकर पारण करें।
पौष मास (शुक्ल पक्ष)भगवान
पौष पुत्रदा एकादशी
संतान प्राप्ति, संतान की दीर्घायु और कुल की रक्षा हेतु यह व्रत अत्यंत फलदायी माना गया है।
पारण नियम: द्वादशी को पीले फल और खीर का भोग लगाकर पारण करें।
माघ मास (कृष्ण पक्ष)भगवान
षटतिला एकादशी
इस दिन तिल का छह प्रकार से प्रयोग किया जाता है—तिल जल से स्नान, तिल उबटन, तिल हवन, तिल तर्पण, तिल भोजन और तिल का दान। इससे दरिद्रता का नाश होता है।
पारण नियम: द्वादशी को काले तिल और गुड़ की खिचड़ी दान कर पारण करें।
माघ मास (शुक्ल पक्ष)भगवान
जया एकादशी (भौमी एकादशी)
पिशाच योनि, प्रेत बाधा और घोर पापों से मुक्ति दिलाने वाली एकादशी। इस व्रत के पुण्य से जीवात्मा को कभी नीच योनि में जन्म नहीं लेना पड़ता।
पारण नियम: द्वादशी को विष्णु भगवान को मिश्री-माखन अर्पित कर पारण करें।
फाल्गुन मास (कृष्ण पक्ष)भगवान
विजया एकादशी
शत्रुओं पर विजय और कठिन से कठिन संकटों में सफलता प्राप्ति हेतु यह व्रत अचूक माना गया है।
पारण नियम: द्वादशी के दिन कलश के जल से आचमन कर सात प्रकार के धान्य दान कर पारण करें।
फाल्गुन मास (शुक्ल पक्ष)भगवान
आमलकी एकादशी (आंवला एकादशी)
आंवले के वृक्ष की विधिवत पूजा और आंवले का सेवन करने से समस्त रोगों का नाश और मोक्ष की प्राप्ति होती है। आंवले में भगवान विष्णु का वास माना गया है।
पारण नियम: द्वादशी को आंवले का मुरब्बा या आंवले का चूर्ण जल में मिलाकर पारण करें।
चैत्र मास (कृष्ण पक्ष)भगवान
पापमोचिनी एकादशी
ब्रह्महत्या, सुवर्ण चोरी और गुरु द्रोह जैसे महापापों का समूल निवारण करने वाली एकादशी।
पारण नियम: द्वादशी को गाय को हरा चारा व गुड़ खिलाकर पारण करें।
चैत्र मास (शुक्ल पक्ष)भगवान
कामदा एकादशी
मनोवांछित कामनाओं की पूर्ति और शाप निवारण करने वाली एकादशी। नव संवत्सर (हिंदू नववर्ष) की यह प्रथम एकादशी है।
पारण नियम: द्वादशी को पीले वस्त्र का दान देकर पारण करें।
वैशाख मास (कृष्ण पक्ष)भगवान
वरूथिनी एकादशी
यह व्रत मनुष्य को अकाल मृत्यु और दुर्भाग्य से कवच (वरूथि) की भांति सुरक्षित रखता है। कन्यादान के समतुल्य पुण्य फल प्राप्त होता है।
पारण नियम: द्वादशी को कांसे के बर्तन में भोजन न करें; मिट्टी या पत्तल पर पारण करें।
वैशाख मास (शुक्ल पक्ष)भगवान
मोहिनी एकादशी
माया के बंधनों, आसक्ति और मानसिक भटकाव से मुक्ति दिलाने वाली एकादशी। इसी दिन भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर देवताओं को अमृत पिलाया था।
पारण नियम: द्वादशी को चंदन और तुलसी दल का चरणामृत लेकर पारण करें।
ज्येष्ठ मास (कृष्ण पक्ष)भगवान
अपरा एकादशी (अचला एकादशी)
अपार धन-सम्पदा, यश और प्रतिष्ठा प्रदान करने वाली एकादशी। यह त्रिवेणी संगम में स्नान और केदारनाथ दर्शन के समतुल्य पुण्य देती है।
पारण नियम: द्वादशी को ब्राह्मण को चप्पल, छाता या जलपात्र का दान देकर पारण करें।
ज्येष्ठ मास (शुक्ल पक्ष)भगवान
निर्जला एकादशी (भीमसेनी एकादशी)
समस्त 24 एकादशियों में सर्वाधिक कठोर एवं फलदायी महाव्रत। इस दिन बिना जल और अन्न ग्रहण किए 24 घंटे का उपवास रखने से वर्षभर की समस्त एकादशियों का पुण्य एक साथ प्राप्त हो जाता है।
पारण नियम: द्वादशी को सूर्योदय के पश्चात मिट्टी के घड़े में जल भरकर, खरबूजा, पंखा और वस्त्र दान देकर ही जल ग्रहण करें।
आषाढ़ मास (कृष्ण पक्ष)भगवान
योगिनी एकादशी
समस्त प्रकार के चर्म रोग, कुष्ठ रोग और शारीरिक कष्टों से मुक्ति दिलाने वाली पावन एकादशी।
पारण नियम: द्वादशी को शुद्ध जल में गंगाजल मिलाकर पारण करें।
आषाढ़ मास (शुक्ल पक्ष)क्षीरसागरशायी
देवशयनी एकादशी (आषाढ़ी / हरिशयनी एकादशी)
इस दिन से भगवान श्रीहरि क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर चार माह के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसी दिन से चातुर्मास आरम्भ होता है और समस्त शुभ-मांगलिक कार्य (विवाह, मुंडन आदि) चार माह के लिए विश्राम लेते हैं।
पारण नियम: द्वादशी को पीले पुष्प और तुलसी दल से श्रीहरि की शयन आरती कर पारण करें।
श्रावण मास (कृष्ण पक्ष)भगवान
कामिका एकादशी
चातुर्मास की प्रथम एकादशी जो श्रावण मास में आती है। इस दिन तुलसी पत्र से भगवान विष्णु का पूजन करने से सौ सूर्य ग्रहण स्नान का फल प्राप्त होता है।
पारण नियम: द्वादशी को पंचामृत का पान कर पारण करें।
श्रावण मास (शुक्ल पक्ष)भगवान
श्रावण पुत्रदा एकादशी (पवित्रोपना एकादशी)
संतान के सुख, विद्या, बुद्धि और दीर्घायु की कामना हेतु श्रावण शुक्ल एकादशी का व्रत अमोघ फलदायक है।
पारण नियम: द्वादशी को फल और दूध का दान देकर पारण करें।
भाद्रपद मास (कृष्ण पक्ष)भगवान
अजा एकादशी (अन्नदा एकादशी)
खोया हुआ राज्य, सम्मान और सुख वापस दिलाने वाली एकादशी। सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने इसी व्रत के प्रभाव से अपना राज्य और पुत्र पुनः प्राप्त किया था।
पारण नियम: द्वादशी को अन्न दान देकर सात्विक भोजन से पारण करें।
भाद्रपद मास (शुक्ल पक्ष)भगवान
परिवर्तिनी एकादशी (पार्श्व / जलझूलनी एकादशी)
योगनिद्रा में शयन कर रहे भगवान श्रीहरि इस दिन करवट बदलते हैं। इसी दिन वामन अवतार की जयंती भी मनाई जाती है। भगवान को पालकी में बिठाकर जलाशय में स्नान (जलझूलनी) कराया जाता है।
पारण नियम: द्वादशी को दही और चावल का दान देकर पारण करें।
आश्विन मास (कृष्ण पक्ष)भगवान
इन्दिरा एकादशी (पितृ पक्ष एकादशी)
पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) में आने वाली परम पावन एकादशी। इस दिन व्रत रखकर उसका पुण्य अपने मृत पूर्वजों को समर्पित करने से यमलोक में कष्ट भोग रहे पितरों को तुरंत मुक्ति मिल जाती है।
पारण नियम: द्वादशी को पितरों के निमित्त तर्पण एवं ब्राह्मण भोजन कराकर पारण करें।
आश्विन मास (शुक्ल पक्ष)भगवान
पापांकुशा एकादशी
पापों पर अंकुश लगाने वाली एकादशी। जो मनुष्य इस दिन भगवान पद्मनाभ का पूजन करता है, वह समस्त शारीरिक, मानसिक और वाचिक पापों से मुक्त हो जाता है।
पारण नियम: द्वादशी को सुवर्ण अथवा तांबे का दान देकर पारण करें।
कार्तिक मास (कृष्ण पक्ष)भगवान
रमा एकादशी
दीपावली से चार दिन पूर्व आने वाली एकादशी। "रमा" माँ लक्ष्मी का नाम है। इस दिन भगवान विष्णु और माँ लक्ष्मी का संयुक्त पूजन करने से घर में अक्षय धन-धान्य की वृद्धि होती है।
पारण नियम: द्वादशी को खीर और बताशे का भोग लगाकर पारण करें।
कार्तिक मास (शुक्ल पक्ष)जागृत
देवउठनी एकादशी (प्रबोधिनी / देवप्रबोधिनी एकादशी)
चार माह के शयन के पश्चात भगवान श्रीहरि योगनिद्रा से जाग्रत होते हैं। चातुर्मास समाप्त होता है और इसी दिन तुलसी विवाह के साथ समस्त मांगलिक कार्य (विवाह, गृह प्रवेश, यज्ञोपवीत) पुनः आरम्भ होते हैं।
पारण नियम: द्वादशी को गन्ने का मंडप बनाकर तुलसी विवाह का प्रसाद ग्रहण कर पारण करें।