
“नौ दिनों के पावन अनुष्ठान, कलश स्थापना, अखंड ज्योति एवं दुर्गा सप्तशती पाठ की प्रामाणिक पद्धति”
नवरात्रि नारी शक्ति और भगवती पराशक्ति के नौ स्वरूपों का महापर्व है। कलश में समस्त तीर्थों और देवताओं का वास होता है तथा जौ (जवारे) बोने से घर में अन्न-पूर्णा का वास और सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है। अखंड ज्योति अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाती है।
यह पर्व आत्मसंयम, उपवास और शक्ति की उपासना का संदेश देता है। बच्चों को देवी के 9 रूपों (शैलपुत्री से सिद्धिदात्री) का परिचय कराने और मातृशक्ति के प्रति आदरभाव जागृत करने का यह सर्वोपरि अवसर है।
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घर पर स्वयं करने हेतु सरल एवं प्रमाणिक विधि
कुश के आसन पर बैठकर तीन बार आचमन करें। हाथ में जल, अक्षत, सिक्का और पुष्प लेकर नौ दिनों के उपवास, दुर्गा सप्तशती पाठ और अखंड ज्योति का संकल्प लें।
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
सरल अर्थ: पुण्डरीकाक्ष भगवान का स्मरण कर मैं अंतःकरण और बाह्य शरीर से शुद्ध होकर भगवती का आवाहन करता हूँ।
मिट्टी के चौड़े पात्र में साफ मिट्टी की एक परत बिछाएं। उस पर जौ के दाने छिड़कें, फिर ऊपर से मिट्टी की हल्की परत डालकर थोड़ा गंगाजल छिड़कें।
ॐ धान्यमसि धिनुहि देवान् प्राणाय त्वो दानाय त्वा व्यानाय त्वा। दीर्घामनु प्रसितिमायुषे धां देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रतिगृभ्णात्वच्छिद्रेण पाणिना॥
सरल अर्थ: यह धान्य देवताओं को तृप्त करने वाला और जीवन का आधार है। सविता देव कृपापूर्वक इसे स्वीकार करें।
जौ वाले पात्र के बीच में कलश रखें। कलश में जल, गंगाजल, सुपारी, हल्दी की गांठ, सिक्का और दूर्वा डालें। मुख पर 5 आम के पत्ते लगाकर उस पर लाल कपड़े में लिपटा नारियल रखें।
कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः। मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः॥
सरल अर्थ: कलश में समस्त त्रिदेव और देवी मातृकाएं वास करती हैं। हे कलश देवता! आप हमारे अनुष्ठान को सफल करें।
माँ दुर्गा के दाईं ओर गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें। यह दीपक नौ दिनों तक बिना बुझे निरंतर जलता रहेगा।
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥
सरल अर्थ: जयंती, मंगला, काली, भद्रकाली, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा नामों से प्रसिद्ध हे जगदम्बे! आपको मेरा नमन।
प्रतिमा पर रोली, अक्षत, लाल गुड़हल के फूल, 16 श्रृंगार और चुनरी चढ़ाएं। इसके पश्चात कवच, कीलक, अर्गला स्तोत्र और दुर्गा सप्तशती के अध्यायों का सस्वर पाठ करें।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥
सरल अर्थ: सरस्वती, लक्ष्मी और महाकाली स्वरूपिणी चामुण्डा देवी को मेरा नमन है, वे मेरे अज्ञान का भेदन करें।
हलवा, चना और पूरी का भोग लगाएं। लौंग के जोड़े पर कर्पूर रखकर "अम्बे तू है जगदम्बे काली" की आरती करें। अष्टमी या नवमी को 9 कन्याओं और 1 बटुक (लंगूर) का पाँव धोकर भोजन कराएं।
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
सरल अर्थ: सब मंगलों में मंगल रूप, कल्याणमयी, समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली, तीन नेत्रों वाली नारायणी गौरी! आपको नमन।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥
अर्थ: महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली का संयुक्त महाबीज मंत्र जो समस्त भयों और विघ्नों का समूल नाश करता है।
लाभ: शत्रु भय, नकारात्मक ऊर्जा, और मानसिक अवसाद से तुरंत मुक्ति।
अपराधसहस्त्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया। दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि॥
अर्थ: हे परमेश्वरि! मेरे द्वारा दिन-रात हजारों अपराध होते रहते हैं। मुझे अपना सेवक मानकर कृपापूर्वक क्षमा करें।
लाभ: पूजा में हुई किसी भी भूल-चूक के दोष से मुक्ति।
कुल 7 वस्तुएं
काशी एवं हरिद्वार के प्रामाणिक ब्राह्मणों द्वारा ऑनलाइन अथवा घर पर आकर शास्त्रसम्मत पूजन संपन्न कराया जाएगा।
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