
सती के शीश व नयन · माँ शाकंभरी व भूरादेव भैरव · शिवालिक सुरम्य घाटी
शाकम्भरीति विख्याता ततो यास्याम्यहं भुवि। शताक्षी चेति मां लोकाः कीर्तयिष्यन्ति सर्वदा॥
भावार्थ: मैं अपने शरीर से शाक उत्पन्न कर संसार का भरण करूंगी, अतः पृथ्वी पर शाकंभरी और शताक्षी नाम से विख्यात होउंगी।
दुर्गमासुर दैत्य के अत्याचार से जब पृथ्वी पर 100 वर्षों तक वर्षा नहीं हुई, तब ऋषियों के विलाप पर माँ ने सौ नेत्रों से अश्रु प्रवाहित किए (शताक्षी) और शाक-फल उत्पन्न कर पोषण किया (शाकंभरी)।
दुर्गा सप्तशती के मूर्ति रहस्य और ग्यारहवें अध्याय में माता शाकंभरी और शताक्षी अवतार का विस्तृत वर्णन है। मान्यता है कि यहाँ पहले बाबा भूरादेव (भैरव) के दर्शन किए जाते हैं।
पर्वत घाटी के बीच स्थित इस मंदिर में माँ शाकंभरी के साथ भीमा, भ्रामरी और शताक्षी देवियों के दिव्य विग्रह एक साथ सुशोभित हैं।
| आरती का नाम | सटीक समय | महत्व व अनुष्ठान |
|---|---|---|
| प्रातः मंगला आरती | प्रातः 05:30 | शाक-फल अर्पण व दिव्य श्रृंगार |
| संध्या महाआरती | सायं 07:00 | दीपदान व दुर्गा स्तुति |
धोती-कुर्ता या सादे परिधान
साड़ी या सलवार सूट
💡 बरसात के दिनों में पहाड़ी नदी के बहाव का ध्यान रखें।
लाखों श्रद्धालुओं का परंपरागत गुलाल उत्सव
अखंड ज्योति पाठ एवं शतचंडी अनुष्ठान
देहरादून या दिल्ली एयरपोर्ट से सड़क मार्ग द्वारा सहारनपुर होते हुए मंदिर पहुंचा जा सकता है।
सहारनपुर जंक्शन उत्तर रेलवे का प्रमुख जंक्शन है, जहाँ से बेहट होकर टैक्सियां व बसें उपलब्ध हैं।
सहारनपुर शहर से बेहट मार्ग द्वारा 40 किमी की दूरी पर नियमित बस सेवा उपलब्ध है।
100% सात्विक, गंगाजल अभिमंत्रित, संपूर्ण विधि पुस्तिका सहित घर पहुँचाई जाती है।
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