अनंत शयन मुद्रा में भगवान महाविष्णु · विश्व का सर्वाधिक दिव्य वैभव · तिरुवनंतपुरम
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥ ॐ नमो नारायणाय॥
भावार्थ: जिनका शांत स्वरूप है, जो शेषनाग की शैय्या पर विश्राम करते हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के ईश्वर, विश्व के आधार और सर्वलोकों के स्वामी हैं, उन भगवान पद्मनाभ नारायण को मैं वंदन करता हूँ।
विल्वमंगलम स्वामी नामक महान वैष्णव संत जब भगवान की आराधना कर रहे थे, तो एक शरारती बालक ने उनकी पूजा में विघ्न डाला। क्रोध में स्वामीजी ने बालक को धक्का दिया। बालक ने प्रकट होकर कहा कि यदि मुझे देखना चाहते हो तो "अनंतनकाडु" आओ। वहाँ पहुँचने पर एक विशाल इल्लुपा का वृक्ष गिर पड़ा और भगवान 18 फीट के विराट स्वरूप में शेषनाग पर लेटे प्रकट हुए।
1750 में त्रावणकोर के पराक्रमी महाराजा मार्तंड वर्मा ने अपना संपूर्ण राज्य "तृप्पदिदानम" अनुष्ठान द्वारा भगवान पद्मनाभ को समर्पित कर दिया और स्वयं तथा उनके वंशज "पद्मनाभ दास" (भगवान के सेवक) कहलाए। मंदिर के भूमिगत 6 विशाल तहखानों (Vaults) में खरबों रुपये का प्राचीन स्वर्ण, रत्न, हीरे-जवाहरात और आभूषण सुरक्षित हैं।
गर्भगृह में भगवान के संपूर्ण विग्रह के दर्शन एक साथ नहीं होते, बल्कि तीन अलग-अलग दरवाजों से होते हैं: पहले द्वार से भगवान का मुखमंडल व शिव-लिंग दर्शन, दूसरे द्वार से नाभि से निकला कमल व ब्रह्मा जी का दर्शन, और तीसरे द्वार से उनके पावन चरण कमलों के दर्शन होते हैं। गलियारे में 365 ग्रेनाइट के खंभे हैं जिन पर रामायण के प्रसंग उत्कीर्ण हैं।
| आरती का नाम | सटीक समय | महत्व व अनुष्ठान |
|---|---|---|
| निर्मल्य दर्शन | प्रातः 03:15 - 04:15 | दिन का प्रथम दर्शन |
| उषा पूजा | प्रातः 06:30 - 07:00 | प्रातःकालीन भोग |
| उचा पूजा (मध्याह्न) | दोपहर 11:30 - 12:00 | दोपहर का राजभोग |
| दीपारधना (संध्या आरती) | सायं 06:30 - 07:00 | हजारों पीतल के दीपों की ज्योति में अलौकिक आरती |
| अथाझा पूजा (शयन) | रात्रि 07:45 - 08:30 | दिन की अंतिम पूजा |
अत्यंत सख्त नियम: केवल श्वेत सूती मुंडू (धोती) पहनना अनिवार्य है। शरीर के ऊपरी हिस्से पर कोई भी वस्त्र (कमीज, बनियान) नहीं होना चाहिए। पैंट, जींस पूर्णतः वर्जित हैं।
पारंपरिक साड़ी, मुंडुम नेरियथुम (केरल साड़ी) या पावड़ा। सलवार-सूट, लेगिंग्स या पैंट पूर्णतः निषिद्ध हैं।
💡 मंदिर के द्वार पर ₹40-50 में पारंपरिक धोती किराए या खरीद पर उपलब्ध रहती है जिसे पैंट के ऊपर भी लपेटा जा सकता है।
10 दिवसीय द्विवार्षिक उत्सव जिसमें शंगुमुखम समुद्र तट पर भव्य "आराट्टू" (पवित्र स्नान यात्रा)
56 दिनों तक वेदों का अखंड पाठ और 1 लाख दीपों से जगमगाता मंदिर
विशुकणी दर्शन एवं स्वर्ण सिक्कों का वितरण
त्रिवेंद्रम एयरपोर्ट मंदिर के बिल्कुल निकट है जहाँ से ऑटो या कैब द्वारा 10 मिनट में पहुँचा जा सकता है।
तिरुवनंतपुरम सेंट्रल स्टेशन से मंदिर पैदल दूरी (1 किमी) पर है। देश के हर भाग से सीधी रेल कनेक्टिविटी है।
कोच्चि (205 किमी), कन्याकुमारी (85 किमी) और मदुरै (300 किमी) से उत्तम 4-लेन राजमार्ग उपलब्ध है।
100% सात्विक, गंगाजल अभिमंत्रित, संपूर्ण विधि पुस्तिका सहित घर पहुँचाई जाती है।
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