सर्वोच्च शक्तिपीठ · सती का ब्रह्मरंध्र (शीश भाग) · हिंगोल गुफा धाम
ब्रह्मरन्ध्रं पपातात्र हिंगुलायां महेश्वरि। कोट्टरी सा महादेवी भीमलोचनो भैरवः॥
भावार्थ: हिंगुला तीर्थ में माता सती का ब्रह्मरंध्र गिरा, जहाँ कोट्टरी रूप में महादेवी और भीमलोचन रूप में भैरव विराजमान हैं।
दक्ष प्रजापति के यज्ञ कुंड में जब माता सती ने देहत्याग किया, तब भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर तांडव करने लगे। भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से कटकर माता का सबसे पवित्र अंग—ब्रह्मरंध्र यहाँ गिरा।
श्री राम ने रावण वध के ब्रह्महत्या दोष से निवृत्ति हेतु यहाँ तपस्या की थी। गुरु गोरखनाथ और गुरु नानक देव जी ने भी यहाँ साधना की थी। इसे "नानी का हज" भी कहा जाता है और श्रद्धालु यहाँ अटूट श्रद्धा से शीश नवाते हैं।
यहाँ कोई मानव निर्मित मूर्ति नहीं है; एक विशाल प्राकृतिक शैल गुफा के भीतर सिंदूर लेपित पवित्र पिंडी शिला स्वरूप में माता हिंगलाज प्रतिष्ठित हैं।
| आरती का नाम | सटीक समय | महत्व व अनुष्ठान |
|---|---|---|
| मंगला आरती | प्रातः 05:30 | प्रातः काल सिंदूर व ज्योति वंदन |
| संध्या महाआरती | सायं 07:00 | गुफा प्रांगण में दीप प्रज्वलन एवं स्तुति |
धोती-कुर्ता या सादे पारम्परिक वस्त्र
साड़ी या सलवार-सूट, सिर ढंकना अनिवार्य
💡 दुर्गम मरुस्थलीय यात्रा हेतु आरामदायक चरण पादुकाएं और पर्याप्त जल साथ रखें।
विशाल मरुस्थलीय पैदल परिक्रमा व चंद्रकूप पूजन
अखंड ज्योति पाठ एवं शतचंडी महायज्ञ
कराची एयरपोर्ट तक उड़ान भरकर वहाँ से मकरान कोस्टल हाईवे द्वारा सड़क मार्ग से पहुँचा जाता है।
कराची स्टेशन से निजी वाहन या तीर्थयात्री काफिले के साथ यात्रा की जाती है।
कराची से मकरान कोस्टल हाईवे (N10) होकर हिंगोल नेशनल पार्क (लगभग 4 से 5 घंटे) पहुंचा जाता है।
100% सात्विक, गंगाजल अभिमंत्रित, संपूर्ण विधि पुस्तिका सहित घर पहुँचाई जाती है।
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