51 शक्तिपीठों में पावन कुहनी पीठ · चक्रवर्ती विक्रमादित्य की कुलदेवी
हर्षप्रदात्री हरसिद्धि देवि विक्रमादित्यपूजिते। नमस्ते वरदे मातर्मम सर्वार्थसाधिके॥
भावार्थ: हर्ष और आनंद देने वाली, विक्रमादित्य द्वारा पूजित माँ हरसिद्धि! मेरे समस्त मनोरथों को सिद्ध करें।
सती की कोहनी यहाँ गिरी थी। देवी भागवत के अनुसार चंड और मुंड राक्षसों के वध के कारण देवताओं ने हर्षित होकर इनका नाम "हरसिद्धि" रखा।
सम्राट विक्रमादित्य ने माँ हरसिद्धि की कठोर तपस्या की थी और 11 बार अपना शीश अर्पित किया था। माँ ने प्रसन्न होकर उन्हें पराक्रम व न्याय का वरदान दिया।
प्रांगण में स्थित 51 फीट ऊँचे दो विशाल पाषाण दीपस्तंभ। संध्या आरती के समय जब इन पर सैकड़ों दीप प्रज्वलित किए जाते हैं, तो पूरा प्रांगण जगमगा उठता है।
| आरती का नाम | सटीक समय | महत्व व अनुष्ठान |
|---|---|---|
| मंगला आरती | प्रातः 05:30 - 06:15 | प्रातः पूजन |
| दीपस्तंभ महाआरती | सायं 07:00 - 08:00 | 1011 दीपों की आरती |
| शयन आरती | रात्रि 10:00 - 10:30 | शयन |
शालीन सात्विक परिधान।
साड़ी या सलवार-सूट।
💡 दीपस्तंभ के समीप सावधानी बरतें।
प्रतिदिन दीपस्तंभ रोशनी, लाखों श्रद्धालु
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