
भूलोक वैकुंठ · भगवान श्रीकृष्ण द्वारा स्वयं पूजित पाताल अंजन शिला विग्रह
अग्रे पश्यामि तेजो निबिडतरकलायावलीलोभनीयं पीयूषाप्लावितोऽहं तदनु तदुदरे दिव्यकैशोरवेषम्। तारुण्यारम्भरम्यं परमसुखरसास्वादरोमाञ्चिताङ्गैः आवीतं नारदाद्यैर्विलसत उपनिषत्सुन्दरीमण्डलैश्च॥
भावार्थ: हे गुरुवायूर के नाथ! मैं अपने सम्मुख नीलमेघ के समान परम तेजोमय, अमृत से सिंचित, दिव्य किशोर रूप भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन कर रहा हूँ।
भगवान श्रीकृष्ण यहाँ नन्हें "उण्णिकृष्णन" (बाल रूप) में विराजित हैं। पूनथानम नामक अनन्य भक्त के प्रेम पर रीझकर भगवान ने स्वयं उनके सरल ज्ञान को विद्वानों से श्रेष्ठ घोषित किया था।
द्वारका के जलमग्न होने पर देवगुरु बृहस्पति और वायुदेव ने इस विग्रह को लाकर यहाँ स्थापित किया (गुरु + वायु = गुरुवायूर)। महाकवि नारायण भट्टतिरि ने पक्षाघात से मुक्ति पाने हेतु यहीं बैठकर अमर स्तोत्र "नारायणीयम्" की रचना की थी।
विशाल तांबे व स्वर्ण से मढ़ा हुआ श्रीकोविल (गर्भगृह) और प्रांगण में 33.5 मीटर ऊंचा विशाल दीपस्तंभ जिसमें हजारों दीप प्रज्वलित होते हैं।
| आरती का नाम | सटीक समय | महत्व व अनुष्ठान |
|---|---|---|
| निर्मल्य दर्शन | प्रातः 03:00 | पूर्व दिवस के पुष्प श्रृंगार में भगवान का प्रथम दर्शन |
| उचा पूजा (महाभोग) | दोपहर 12:00 | अमृत नैवेद्य व राजसी भोग |
| दीपाराधना | सायं 06:30 | सहस्त्र दीपों का प्रज्वलन व शंखनाद |
सफेद सूती धोती (मुंडू) अनिवार्य, शर्ट/बनियान उतारना अनिवार्य
साड़ी या केरल कसावु मुंडू-वेष्टि
💡 कड़े ड्रेस कोड का सख्ती से पालन करें।
10 दिवसीय उत्सव जिसमें प्रसिद्ध "आनयोत्तम" (हाथियों की दौड़) होती है
लाखों दीपों से मंदिर की महा सजावट
कोच्चि एयरपोर्ट से 2 घंटे में कैब द्वारा सीधे गुरुवायूर पहुँचा जा सकता है।
त्रिशूर रेलवे स्टेशन दक्षिण भारत का प्रमुख जंक्शन है जहाँ से 40 मिनट में बस/टैक्सी मिलती है।
कोच्चि, त्रिशूर और कोझिकोड से चौबीसों घंटे सीधी केरल राज्य परिवहन (KSRTC) बसें उपलब्ध हैं।
100% सात्विक, गंगाजल अभिमंत्रित, संपूर्ण विधि पुस्तिका सहित घर पहुँचाई जाती है।
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