सती की दाहिनी भुजा (दक्षिण बाहु) · माँ भवानी व चंद्रशेखर भैरव · सीताकुंड तीर्थ
चट्टले दक्षबाहुर्मे भैरवश्चन्द्रशेखरः। व्यक्तरूपा भगवती भवानी वरदा सदा॥
भावार्थ: चट्टल पर्वत पर सती की दाहिनी भुजा गिरी जहाँ चंद्रशेखर भैरव और साक्षात भवानी देवी भक्तों को वरदान देती हैं।
सती की दक्षिण बाहु के पतन से यह पर्वत सिद्ध तपोभूमि बन गया जहाँ महर्षि व्यास और भृगु ने भी तपस्या की थी।
वनवास काल में भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण जी यहाँ ठहरे थे जहाँ सीता जी ने कुंड में स्नान किया था (सीताकुंड)। पहाड़ी पर अनगिनत गर्म जल के प्राकृतिक सोते (बड़वानल) हैं।
चंद्रनाथ पर्वत की चोटी पर स्थित मंदिर जहाँ तक पहुंचने के लिए 2,200 से अधिक सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। चोटी से बंगाल की खाड़ी का विहंगम दृश्य दिखाई देता है।
| आरती का नाम | सटीक समय | महत्व व अनुष्ठान |
|---|---|---|
| प्रातः मंगला आरती | प्रातः 06:00 | पर्वत शिखर पर सूर्योदय संग दिव्य अभिषेक |
| संध्या आरती | सायं 06:00 | शंखनाद व दीप आराधना |
धोती-कुर्ता या ट्रैकिंग हेतु आरामदायक वस्त्र
साड़ी या सलवार सूट
💡 सीढ़ियां चढ़ने हेतु आरामदायक जूते और पानी की बोतल साथ रखें।
लाखों अंतरराष्ट्रीय श्रद्धालुओं का विशालतम 3 दिवसीय मेला
सीताकुंड व बड़वानल कुंड में पवित्र स्नान
चटगांव एयरपोर्ट से टैक्सी द्वारा 1 घंटे में सीताकुंड पहुँचा जा सकता है।
ढाका और चटगांव के बीच चलने वाली सभी प्रमुख ट्रेनें सीताकुंड स्टेशन पर रुकती हैं।
ढाका-चटगांव 4-लेन राष्ट्रीय राजमार्ग (N1) पर सीताकुंड सीधे स्थित है।
100% सात्विक, गंगाजल अभिमंत्रित, संपूर्ण विधि पुस्तिका सहित घर पहुँचाई जाती है।
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