
सती के दाहिने हाथ की अंगुलियां · माँ ललिता व भव भैरव · त्रिवेणी संगम
प्रयागे ललिता देवी भवश्च भैरवः स्मृतः। अंगुल्यः पतिता यत्र सर्वसिद्धिप्रदायिनी॥
भावार्थ: प्रयाग में ललिता देवी और भव भैरव विराजते हैं, जहाँ सती की अंगुलियां गिरीं और जो सर्वसिद्धि प्रदान करती हैं।
माता सती के पार्थिव देह से जब अंतिम अंग यहाँ गिरा, तो वह तत्काल अंतर्धान (अलोप) हो गया, जिससे माता को "अलोपशंकरी" कहा गया।
तीर्थराज प्रयाग में त्रिवेणी संगम स्नान के उपरांत अलोपी देवी और ललिता देवी के दर्शन का विशेष विधान है। कुंभ और माघ मेले में लाखों संत यहाँ शीश नवाते हैं।
गर्भगृह के केंद्र में संगमरमर का कुंड है जिसके ऊपर काष्ठ व रजत जड़ित पावन पालकी (झूला) सुसज्जित है।
| आरती का नाम | सटीक समय | महत्व व अनुष्ठान |
|---|---|---|
| मंगला आरती | प्रातः 05:30 | पालकी श्रृंगार व मंगला भोग |
| संध्या महाआरती | सायं 07:30 | दीपदान व स्तुति गान |
धोती, कुर्ता या शालीन परिधान
साड़ी या सलवार सूट
💡 पालकी के पवित्र चबूतरे की गरिमा का ध्यान रखें।
9 दिनों तक दिव्य झूला उत्सव
महाष्टमी व नवमी को छप्पन भोग
प्रयागराज एयरपोर्ट से कैब द्वारा 30 मिनट में मंदिर पहुंचा जा सकता है।
प्रयागराज जंक्शन, प्रयाग और नैनी स्टेशन से ऑटो/टैक्सी आसानी से उपलब्ध हैं।
वाराणसी (120 किमी), लखनऊ (200 किमी) और कानपुर (200 किमी) से सीधी बसें हैं।
100% सात्विक, गंगाजल अभिमंत्रित, संपूर्ण विधि पुस्तिका सहित घर पहुँचाई जाती है।
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