
“देवाधिदेव महादेव शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन की कल्याणकारी महाकाल रात्रि”
शिव-शक्ति के एकाकार होने की परम पावन तिथि। इस दिन चारों प्रहर का रुद्राभिषेक समस्त पापों का शमन कर मोक्ष प्रदान करता है।
इस दिन भगवान शिव ने समुद्र मंथन से निकले कालकूट हलाहल विष का पान कर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रक्षा की थी। इसी रात्रि शिव-पार्वती का पाणिग्रहण संस्कार हुआ था।
शिव पुराण के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन जो भक्त बेलपत्र, गंगाजल, भस्म और धतूरे से शिवलिंग की पूजा करता है, उसे कोटि अश्वमेध यज्ञ का पुण्य प्राप्त होता है।
प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर गंगाजल मिश्रित जल से स्नान
शिवलिंग पर दूध, दही, घी, शहद और शर्करा (पंचामृत) से अभिषेक
त्रिदल बेलपत्र पर ॐ नमः शिवाय लिखकर शिवलिंग पर अर्पण
भस्म लेपन, आक-धतूरा, भांग एवं शमी पत्र अर्पण
चारों प्रहर महामृत्युंजय मंत्र जप एवं रुद्राभिषेक
निशीथ काल (मध्यरात्रि का समय) भगवान शिव की विशेष आराधना हेतु सर्वोत्तम माना जाता है।
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