
“भगवान शिव द्वारा त्रिपुरासुर संहार पर काशी के 84 गंगा घाटों पर देवताओं का दीपदान”
कार्तिक पूर्णिमा के पावन अवसर पर काशी के समस्त गंगा घाटों पर लाखों मिट्टी के दीप जलाकर मनाया जाने वाला अलौकिक महापर्व। मान्यता है कि इस दिन स्वयं देवता स्वर्ग से उतरकर गंगा तट पर दीपावली मनाते हैं।
शिव पुराण के अनुसार जब भगवान शिव ने तीनों लोकों को त्रस्त करने वाले भयंकर राक्षस त्रिपुरासुर का संहार किया, तब समस्त देवगणों ने प्रसन्न होकर काशी नगरी में आकर दीप प्रज्वलित किए थे। इसलिए भगवान शिव को "त्रिपुरारी" भी कहा जाता है।
इसी पावन कार्तिक पूर्णिमा पर भगवान श्रीहरि विष्णु ने वेदों की रक्षा हेतु मत्स्य अवतार धारण किया था। इस दिन गंगा स्नान और दीपदान करने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।
संध्या समय गंगा स्नान अथवा गंगाजल छिड़ककर आत्मशुद्धि
मिट्टी के दीपकों में तिल का तेल अथवा देशी घी डालकर दीपदान करना
भगवान शिव का पंचामृत अभिषेक और "ॐ नमः शिवाय" व महामृत्युंजय मंत्र जप
माँ गंगा की भव्य महाआरती में सम्मिलित होना
ब्राह्मणों एवं जरूरतमंदों को तिल, गुड़, अन्न व वस्त्र का दान
संध्या समय प्रदोष काल में गंगा अथवा किसी भी पवित्र सरोवर के तट पर दीपदान करना सर्वोत्तम माना गया है।
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