
द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख · मोक्षदायिनी अविमुक्त क्षेत्र
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथं, गंगातरंगरमणीयजटाकलापम्। गौरीनिरन्तरविभूषितवामभागं, नारायणप्रियमनंगमदापहारम्॥
भावार्थ: जिनके जटाजूट में गंगा जी की तरंगें सुशोभित हैं, जिनके वाम भाग में माता गौरी विराजमान हैं, जो नारायण के परम प्रिय और कामदेव का मान मर्दन करने वाले हैं—उन काशीपति विश्वनाथ को हम भजते हैं।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु के मध्य जब श्रेष्ठता का विवाद हुआ, तब भगवान शिव एक अंतहीन ज्योतिस्तंभ के रूप में प्रकट हुए। इस ज्योतिर्लिंग का तेज काशी में स्थापित हुआ, जिसे "अविमुक्त क्षेत्र" भी कहा जाता है। गंगा किनारे स्थित यह पावन लिंग संसार के समस्त बंधनों से मुक्ति दिलाता है।
स्कंद पुराण के काशी खंड में उल्लेख है कि प्रलय काल में भी काशी नष्ट नहीं होती क्योंकि भगवान शिव इसे अपने त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं। आदि शंकराचार्य, गोस्वामी तुलसीदास, स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस ने यहाँ तपस्या की। 1780 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने इसका भव्य जीर्णोद्धार कराया तथा महाराजा रणजीत सिंह ने शिखर को 1 टन विशुद्ध स्वर्ण से मढ़वाया।
विशाल नव-निर्मित 5 लाख वर्गफुट में फैला काशी विश्वनाथ धाम गंगा घाट (ललिता घाट) से सीधे गर्भगृह को जोड़ता है। मुख्य मंदिर का शिखर विशुद्ध स्वर्ण से जगमगाता है। गर्भगृह में चांदी के अरघे में स्थापित स्वयंभू शिवलिंग के दर्शन होते हैं।
| आरती का नाम | सटीक समय | महत्व व अनुष्ठान |
|---|---|---|
| मंगला आरती | प्रातः 03:00 - 04:00 | दिन की प्रथम ब्रह्ममुहूर्त आरती, अत्यंत पुण्यदायी |
| मध्याह्न भोग आरती | दोपहर 11:15 - 12:20 | प्रभु को राजभोग अर्पण एवं विश्राम |
| सप्तऋषि आरती | सायं 07:00 - 08:15 | सप्तऋषियों के प्रतिनिधि आचार्यों द्वारा महाआरती |
| रात्रि श्रृंगार आरती | रात्रि 09:00 - 10:15 | पुष्पों व आभूषणों से प्रभु का दिव्य श्रृंगार |
| शयन आरती | रात्रि 10:30 - 11:00 | दिन की अंतिम आरती व प्रभु विश्राम |
गर्भगृह स्पर्श दर्शन हेतु: सात्विक धोती एवं उत्तरीय (अंगवस्त्रम)। सामान्य झांकी दर्शन हेतु: शालीन कुर्ता-पायजामा या पैंट-शर्ट।
साड़ी या सलवार-कुर्ता (दुपट्टा सहित)। पश्चिमी छोटे परिधान, बरमूडा, रिप्ड जीन्स पूर्णतः वर्जित हैं।
💡 स्पर्श दर्शन के समय पुरुषों को केवल श्वेत या पीत सूती/रेशमी धोती पहनना अनिवार्य है, जिसमें सिला हुआ ऊपरी वस्त्र न हो।
चारों प्रहर की अखंड महापूजा एवं भव्य शिव बारात
माता गौरा का गौना एवं बाबा विश्वनाथ संग गुलाल उत्सव
लाखों कांवड़ियों द्वारा गंगाजल से अनवरत जलाभिषेक
काशी के 84 घाटों पर 15 लाख दीपों का दिव्य महोत्सव
बाबतपुर एयरपोर्ट मंदिर से मात्र 26 किमी दूर है, जहाँ से टैक्सी या एसी बस से 45 मिनट में पहुँच सकते हैं।
वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन से मंदिर कॉरिडोर मात्र 5 किमी की दूरी पर है। देश के हर बड़े शहर से सीधी ट्रेनें उपलब्ध हैं।
NH-19 और पूर्वांचल एक्सप्रेसवे से वाराणसी सुगमता से जुड़ा है। गोदौलिया चौराहे तक ऑटो/ई-रिक्शा से पहुँचा जा सकता है।
100% सात्विक, गंगाजल अभिमंत्रित, संपूर्ण विधि पुस्तिका सहित घर पहुँचाई जाती है।
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