
“सोलह कलाओं से युक्त चंद्रमा से बरसती अमृत वर्षा, महालक्ष्मी की कृपा एवं दिव्य महारास”
आश्विन पूर्णिमा की वह पावन निशा जब चंद्रमा अपनी समस्त 16 कलाओं से परिपूर्ण होकर पृथ्वी पर अमृत की वर्षा करता है। इस रात्रि माँ लक्ष्मी भूलोक पर विचरण कर पूछती हैं "को जागर्ति" (कौन जाग रहा है) और जागरण करने वाले साधकों को असीम ऐश्वर्य प्रदान करती हैं।
इसी रात्रि वृंदावन में भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों संग आलौकिक महारास रचाया था। रात्रि में खुले आकाश के नीचे रखी गई खीर चंद्रमा की अमृत किरणों से अभिमंत्रित होकर दिव्य औषधीय और आरोग्यता प्रदान करने वाली बन जाती है।
एक साहूकार की दो पुत्रियां थीं। बड़ी पुत्री विधिपूर्वक व्रत कर खीर का भोग लगाती थी और छोटी पुत्री व्रत भंग कर देती थी। बड़ी पुत्री के पुण्य से छोटी पुत्री की मृत संतान पुनः जीवित हो गई। तब से शरद पूर्णिमा का व्रत आरोग्य और संतान सुख हेतु अनिवार्य माना गया।
दूध, चावल, मिश्री और मेवों से शुद्ध सात्विक खीर तैयार करना
रात्रि में खीर को महीन सफेद वस्त्र से ढककर चंद्रमा की खुली चांदनी में रखना
माँ महालक्ष्मी एवं भगवान श्रीकृष्ण का षोडशोपचार पूजन व आरती
मध्यरात्रि में "ॐ सों सोमाय नमः" एवं "ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं नमः" का जप
अगले दिन प्रातः अमृतमयी खीर को परिवार सहित प्रसाद रूप में ग्रहण करना
मध्यरात्रि के समय चंद्रोदय के उपरांत खीर को चांदनी रात में रखना और माँ लक्ष्मी का कनकधारा स्तोत्र पाठ सर्वोत्तम है।
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