“पवित्र अग्नि में तिल, गुड़, रेवड़ी और नई फसल की आहुति देकर सुख-समृद्धि की मंगलकामना”
सनातन परंपरा व उत्तर भारत का पावन पर्व, जिसमें पवित्र अग्नि देव को तिल, गुड़, मूंगफली और रेवड़ी अर्पित कर परिवार की सुख-समृद्धि, दीर्घायु एवं नवजात शिशु व नवविवाहितों के कल्याण की प्रार्थना की जाती है।
लोहड़ी केवल ऋतु परिवर्तन का उत्सव नहीं बल्कि सूर्य देव के उत्तरायण होने से पूर्व अग्नि देव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का वैदिक पर्व है। अग्नि को सनातन धर्म में प्रत्यक्ष देव और हविष्य के वाहक माना गया है। नई फसल (गेहूं व सरसों) की प्रथम आहुति अग्नि देव को समर्पित की जाती है। यह पर्व परिवार, समाज और भाईचारे को एक सूत्र में पिरोता है।
अग्नि पुराण एवं लोक परंपरा के अनुसार अग्नि में तिल-गुड़ की आहुति देने से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। वीर दुल्ला भट्टी ने मुगल काल में असहाय कन्याओं सुंदरी और मुंदरी को अत्याचारियों से बचाकर अग्नि को साक्षी मानकर उनका विवाह संपन्न कराया था। उसी स्मृति में "सुंदर-मुंदरिए" लोकगीत गाकर लोहड़ी का पावन पर्व मनाया जाता है।
संध्या समय शुद्ध काष्ठ, समिधा एवं उपलों से पवित्र लोहड़ी अग्नि का निर्माण
अग्नि प्रज्वलन कर भगवान अग्नि देव और सूर्य देव का ध्यान व नमन
तिल, गुड़, गजक, रेवड़ी, मूंगफली और मक्के के फूले (पॉपकॉर्न) की अग्नि में आहुति देना
अग्नि देव की 7 बार श्रद्धापूर्वक परिक्रमा (फेरे) लगाकर परिवार के स्वास्थ्य की मंगलकामना
पारंपरिक लोकगीत गायन एवं मक्के की रोटी, सरसों का साग व खीर का सात्विक प्रसाद वितरण
लोहड़ी के दिन सूर्यास्त के पश्चात प्रदोष काल में पवित्र अग्नि प्रज्वलन एवं तिल-गुड़ अर्पण सर्वोत्तम फलदायी माना जाता है।
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