
“भक्त प्रह्लाद की अनन्य भक्ति, अधर्म पर धर्म की अमर विजय और राधा-कृष्ण के दिव्य फाग का महापर्व”
सनातन का अति पावन वसंतोत्सव, जिसमें फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन कर अहंकार, राग-द्वेष और बुराइयों को भस्म किया जाता है और अगले दिन प्राकृतिक रंगों व अबीर-गुलाल से श्री राधा-कृष्ण का रंगोत्सव मनाया जाता है।
दैत्यराज हिरण्यकश्यप के अत्याचारों के सम्मुख बालभक्त प्रह्लाद की अडिग भक्ति की रक्षा भगवान श्रीहरि ने की थी। अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त पापिनी होलिका आग में भस्म हो गई और प्रह्लाद अक्षुण्ण रहे। इसके साथ ही ब्रज धाम में भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराधारानी के दिव्य प्रेम, टेसू के फूलों के रंग और फाग गायन का भी यह आलौकिक उत्सव है।
श्रीमद्भागवत एवं विष्णु पुराण के अनुसार, हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मारने के अनेक प्रयास किए, अंततः होलिका उसे गोद में लेकर चिता पर बैठी। भगवान विष्णु की कृपा से वायु देव ने होलिका का रक्षा कवच उड़ाकर प्रह्लाद पर डाल दिया, जिससे होलिका जल गई। इसके अतिरिक्त भगवान शिव द्वारा कामदेव को भस्म कर पुनः रति को वरदान देने की गाथा भी फाल्गुन पूर्णिमा से जुड़ी है।
फाल्गुन पूर्णिमा को गोबर के बड़कुले, सूखी लकड़ी और उपलों से होलिका की वैदिक स्थापना
गंगाजल छिड़ककर रोली, अक्षत, धूप, दीप और कच्चे सूत से 7 बार होलिका की परिक्रमा
भद्रा रहित शुभ मुहूर्त में होलिका दहन और अग्नि में नई गेहूं-चने की बालियों की आहुति (हवि)
अगले दिन प्रातःकाल होलिका भस्म का ललाट पर तिलक लगाकर आरोग्य की कामना
भगवान श्री राधा-कृष्ण और कुलदेवता को अबीर-गुलाल अर्पित कर प्राकृतिक रंगों का खेल
पारस्परिक कटुता मिटाकर गले मिलना और सात्विक गुझिया व ठंडाई का प्रसाद बांटना
होलिका दहन भद्रा रहित प्रदोष व्यापिनी फाल्गुन पूर्णिमा में ही शास्त्रसम्मत है। भद्रा मुख में दहन सर्वथा वर्जित माना गया है।
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