
“माता पार्वती की कठोर तपस्या से महादेव की प्राप्ति का पावन निर्जला व्रत”
सुहागिन महिलाओं और कुंवारी कन्याओं द्वारा रखा जाने वाला अत्यंत कठिन निर्जला व्रत, जिसमें बालू या काली मिट्टी से शिव-पार्वती और गणेश जी की प्रतिमा बनाकर 16 श्रृंगार के साथ पूजन किया जाता है।
"हरत" का अर्थ है हरण और "आलिका" का अर्थ है सखी। सखियों द्वारा माता पार्वती का हरण कर घने वन में ले जाने पर उन्होंने बालू के शिवलिंग बनाकर महादेव की कठोर तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें अर्धांगिनी स्वीकार किया।
शिव महापुराण के अनुसार नारद जी के कहने पर पर्वतराज हिमालय पार्वती जी का विवाह भगवान विष्णु से कराना चाहते थे, परंतु पार्वती जी मन से शिव जी का वरण कर चुकी थीं। सखियों के सहयोग से गुफा में तपस्या कर उन्होंने शिव जी को पति रूप में प्राप्त किया।
प्रातःकाल निर्जला व्रत का संकल्प लेना
सायंकाल शुद्ध मिट्टी अथवा बालू से शिव, पार्वती और गणेश जी की प्रतिमा निर्माण
माता पार्वती को सुहाग पिटारी (16 श्रृंगार सामग्री) और शिव जी को धोती व अंगवस्त्र अर्पण
हरतालिका तीज व्रत कथा का श्रवण एवं रात्रि जागरण
अगले दिन प्रातः पूजा के उपरांत ब्राह्मण को दान देकर व्रत का पारण करना
प्रदोष काल में सायंकाल शिव-पार्वती का पूजन सर्वोत्तम फलदायी माना गया है। रात्रि में चारों प्रहर पूजन की परंपरा है।
आज का पंचांग देखेंकाशी एवं हरिद्वार के प्रामाणिक वैदिक ब्राह्मणों द्वारा ऑनलाइन वीडियो कॉल अथवा संकल्प पूजा का शास्त्रीय प्रबंध।
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