
“कभी क्षय न होने वाले अक्षय पुण्य, स्वर्ण पूजन एवं सर्वसिद्धि महामुहूर्त का पावन दिवस”
सनातन का वह पावन स्वयंसिद्ध अबूझ मुहूर्त, जिसमें किया गया कोई भी शुभ कार्य, दान, जप और तप कभी क्षय नहीं होता। इस दिन स्वर्ण क्रय, नया व्यापार प्रारंभ और अन्न-जल का दान महाफलदायी माना जाता है।
अक्षय का अर्थ है जिसका कभी नाश न हो। भविष्य पुराण के अनुसार इसी दिन सतयुग और त्रेतायुग का प्रारंभ हुआ था। इसी दिन माँ गंगा स्वर्ग से धरती पर अवतरित हुई थीं, महर्षि वेदव्यास ने महाभारत लिखना प्रारंभ किया था और भगवान परशुराम का अवतरण हुआ था।
महाभारत काल में जब पांडव वनवास में थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को अक्षय पात्र प्रदान किया था, जिससे कभी भोजन समाप्त नहीं होता था। सुदामा जी जब श्रीकृष्ण के पास दरिद्रता दूर करने पहुंचे, तो इसी तिथि पर उनकी दरिद्रता अक्षय ऐश्वर्य में बदल गई थी।
प्रातःकाल गंगा अथवा पवित्र नदियों में स्नान और सूर्य देव को अर्घ्य
भगवान लक्ष्मीनारायण का पंचामृत अभिषेक, तुलसी दल और पीले पुष्प अर्पण
विष्णु सहस्रनाम और कनकधारा स्तोत्र का पाठ
जल से भरा कलश, पंखा, छाता, सत्तू, ककड़ी और खरबूजे का ब्राह्मण को दान
स्वर्ण, रजत, आभूषण अथवा बहीखाते का विधिवत पूजन
यह दिन संपूर्ण रूप से स्वयंसिद्ध अबूझ मुहूर्त है, अतः किसी भी नवीन कार्य, गृह प्रवेश या विवाह हेतु पंचांग शुद्धि की आवश्यकता नहीं होती।
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